Thursday, 13 September 2018

नन रेप केस: आरोपों पर क्या बोले बिशप फ्रैंको

रह वर्षीय तनुजा को अपने बारे में खास जानकारी नहीं. वो नौ साल से यहां पर है. वो बताती है कि उसे गणित की पढ़ाई करनी है.
मनप्रीत कौर बीए सेकेंड ईयर में है. आश्रम वालों ने ही नाभा के एक अच्छे परिवार में उसकी शादी की. वो गर्भवती हैं. आश्रम वालों ने उसके ससुराल वालों से कहा कि वो बीए कर रही है, चूंकि आश्रम से उसका कॉलेज नज़दीक है, इसलिए डिलीवरी तक वह यहीं रहेगी.
मनप्रीत के पति एक कंपनी में काम करते हैं. माता-पिता की मौत के बाद उसके दादा दादी दोनों भाई बहन को यहां छोड़ गए थे लेकिन बाद में वह इसके भाई को यहां से ले गए, लेकिन मनप्रीत को छोड़ गए.
वर्ष 2003 में यह आश्रम शुरू किया गया था. तब से लेकर अब तक कुल चार लड़कियों की शादी की गई. जसबीर कौर और कुलदीप सिंह के मुताबिक़, समाज की एक सेट मानसिकता है कि बेटियां चाहिए ही नहीं और बेटा स्वस्थ चाहिए.ष 1975 से चल रहे लुधियाना के निष्काम सेवा आश्रम में कुल 36 बच्चे हैं. इनमें चार लड़के हैं बाकी लड़कियां. सभी बच्चे स्कूल जाते हैं. यहां की इंचार्ज श्रुति बंसल का कहना है कि यहां की लड़कियां बाहरवीं की पढ़ाई के बाद फैशन डिज़ाइनिंग और इंजीनियरिंग जैसे कोर्स कर रही हैं.
वर्ष 1947 में जालंधर के माता पुष्पा गुजराल नारी निकेतन ट्रस्ट में रहने वाली 20 वर्षीय अमृत का सपना है कि वह या तो पुलिस ऑफ़िसर या आर्मी ऑफ़िसर बने.
माता-पिता की मौत के बाद उसके दादा दादी उसे यहां छोड़ गए थे. अमृत बताती हैं कि पढ़ाई के दौरान कई दफ़ा पता नहीं लगता है कि हम क्या करें, किस लाइन में जाएं लेकिन यहां करियर काउंसलर आते हैं.
ग्यारह साल की अर्शदीप को केवल अंग्रेज़ी बोलने का शौक है. वो बताती है कि इसे शानदार अंग्रेज़ी बोलना सीखना है. यहां कुल 41 लड़कियां हैं और 4 लड़के हैं. यहां की निदेशक नविता जोशी बताती हैं कि बेटियां आज भी भार हैं और ग़लत रिश्तों से आए बच्चों की समाज में कोई जगह नहीं.
'मैं पानी लेने न जाता तो शायद ज़िंदा न होता'
हैदराबाद के निज़ाम म्यूज़ियम में क्या-क्या है?
जालंधर में चाइल्ड हेल्पलाइन चलाने वाले सुरिंदर सैनी के अनुसार उनके पास पूरे पंजाब से हर दिन दो-तीन बच्चों को फेंके जाने की खबरें आती हैं.
कभी झाड़ियों में, कभी कुंए में, नालियों में, गलियों में, कूड़ेदान में, प्लास्टिक बैग में अधमरी हालत में लड़कियां मिलती हैं. जिन्हें कुत्तों ने नोचा होता है और चीटियां खा रही होती हैं. वो कहते हैं कि ग़रीबी, दहेज प्रथा, आलीशान शादियों के मंहगे रिवाज़ और असुरक्षा के चलते एक तबक़ा बेटियां नहीं चाहता है.
बेटे की चाहत पंजाब समेत पूरे देश में है, जिस वजह से कुछ घरों की बेटियां यतीमख़ानों के पालने में पलती हैं.
यूनीक होम की अलका दीदी कहती है 'बेटियों को बेरहमी से ना फेंके, हमें दे दो.'
वह कहती हैं पंजाब के समाज से जब तक 'हाय मुंडा', 'हाय मुंडा' ख़त्म नहीं होगा तब तक बेटियां कूड़ेदानों में फेंकी जाती रहेंगी.
पंजाब में जालंधर, अमृतसर, बउठिंडा, पटियाला, लुधियाना समेत कई ज़िलों में ज़िला प्रशासन ने भंगूड़ा (पालना) भी लगाया है ताकि बच्चों को फेंकने की बजाय समें रख दिया जाए.