Monday, 1 October 2018

क्या ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ से कश्मीर में तनाव कम हुआ?

पाकिस्तान भले ही कह रहा हो कि ऐसी कोई घटना नहीं हुई और घर से भले ही आलोचनाओं के स्वर उठते रहे हों, लेकिन केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार 29 सितंबर 2016 में पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में की गई उस कार्रवाई की दूसरी सालगिरह मना रही है, जिसे वह 'सर्जिकल स्ट्राइक' कहती है.
बीते दो वर्षों में भारत प्रशासित कश्मीर को छोड़ बाक़ी भारत में चरमपंथ की कोई घटना नहीं हुई है. भारत प्रशासित कश्मीर में भी बड़ी संख्या में चरमपंथियों को मुठभेड़ों में मारा गया है. लेकिन कश्मीर अब भी शांति से कहीं दूर नज़र आता है.
'सर्जिकल स्ट्राइक' के एक साल बाद भारतीय गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट संसद में रखी गई थी, जिसमें 2017 को भारत प्रशासित कश्मीर की तीस वर्षों की अस्थिरता का सबसे ख़ूनी साल बताया गया था.
पिछले साल संसद में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2017 में प्रदेश में चरमपंथी हिंसा में इज़ाफा हुआ. ऐसी 342 घटनाएं हुईं, जिनमें 40 आम लोगों की जान चली गई.
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, सशस्त्र चरमपंथियों को ख़त्म करने की दिशा में 2017 को सबसे सफल साल माना गया. सरकार का कहना है कि 2017 में 217 चरमपंथी मार दिए गए. 2016 में यह संख्या 138 थी.
हालांकि इस दौरान जान गंवाने वाले सुरक्षाकर्मियों की संख्या भी बढ़ गई. 2016 में 100 सुरक्षाकर्मी मारे गए, जबकि 2017 में 124.
2018 के नौ महीनों में ही 118 सुरक्षाकर्मियों की मौत हो चुकी है और 25 सितंबर तक इस साल 176 चरमपंथियों को मारा गया है.
सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भारत प्रशासित कश्मीर में हालात चार स्तरों पर ख़राब हुए हैं.
कश्मीर घाटी, ख़ास तौर से दक्षिणी कश्मीर के चार ज़िलों में सशस्त्र चरमपंथियों के लिए समर्थन तेज़ी से बढ़ा है. तीन दशकों में पहली बार ऐसा होने लगा कि लोग घिरे हुए चरमपंथियों को बचाने के लिए मुठभेड़ की जगह पर पहुंच जाते हैं.
पचास से ज़्यादा लोगों की मौत ऐसी ही घटनाओं में हुई. इनमें महिलाएं भी शामिल थीं.
सर्जिकल स्ट्राइक को एलओसी पर पाकिस्तान की 'हरक़तों' के ख़िलाफ़ एक मज़बूत प्रतिरोध के तौर पर पेश किया गया था. लेकिन 2018 के शुरुआती दो महीनों में ही एलओसी पर सीज़फायर तोड़े जाने की 633 घटनाएं हुईं.
सालाना आंकड़े दर्शाते हैं कि 2017 आम लोगों के लिए सबसे हिंसक वर्ष रहा, जिसमें सीज़फायर तोड़े जाने की एलओसी पर 860 और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर 111 घटनाएं हुईं.स साल पीडीपी की अगुवाई वाली सरकार से बीजेपी के हाथ खींच लेने के बाद कश्मीर ने एक भयंकर राजनीतिक अस्थिरता देखी. इसने घाटी में अलगाववादियों का जनाधार मज़बूत किया और भारत के पक्षधर नेताओं के बड़े स्तर पर आम लोगों तक पहुंचने की राह मुश्किल कर दी.
'ऑल आउट' जैसे आक्रामक सैन्य अभियानों में आम नागरिकों की मौत और पैलेट गन की चोटों ने भी अंतरराष्ट्रीय निगाहों का रुख़ भी कश्मीर की ओर मोड़ दिया.
चौथा: यूएन का दख़ल
पहली बार संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार परिषद ने कश्मीर पर रिपोर्ट जारी की.
रिपोर्ट के ज़रिये भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की गई कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार पर्यवेक्षकों को भारत प्रशासित कश्मीर के ज़मीनी हालात के अध्ययन की इजाज़त दी जाए और इस तरह इस मसले में संयुक्त राष्ट्र का सीधा दख़ल हो. भारत की आपत्तियों के बावजूद रिपोर्ट को संयुक्त राष्ट्र के मंच पर बेहिचक स्वीकार कर लिया गया.
सैन्य प्रशासन यहां कहता है कि सर्जिकल स्ट्राइक से एक रणनीतिक बढ़त भारत को मिली है क्योंकि पठानकोट और उरी के बाद वैसे हमले फिर नहीं हुए. लेकिन जानकार मानते हैं कि कश्मीर के भीतर राजनीतिक और सुरक्षा संबधी हालात बिगड़े हैं और जश्न के इस शोर में वे सरकार के लिए एक अप्रिय ध्वनि की तरह हैं.
भारतीय सेना प्रमुख का 'पाकिस्तान के ख़िलाफ़ एक और सर्जिकल स्ट्राइक की ज़रूरत' बताने को भी कई हलकों में 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक की नाकामी के तौर पर देखा जा रहा है.
श्रीनगर के पत्रकार बिलाल फ़ुरक़ानी कहते हैं, "नीतियों में ही कंफ्यूज़न है. कश्मीर के मुद्दे को सिर्फ पाकिस्तान से जोड़कर देखा जाता है. वे समझते हैं कि पाकिस्तान को नियंत्रित कर लेंगे तो कश्मीर शांत रहेगा. 1971 में जब पाकिस्तान का बंटवारा हुआ, उसके एक दशक बाद ही घाटी में ग़ुस्सा पैदा हुआ और हिंसक संघर्ष का सबसे ख़राब दौर शुरू हुआ."

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