अब तक 10 से अधिक महिलाएं #MeToo के ज़रिए एमजे अकबर पर यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के आरोप लगा चुकी हैं.
ये अधिकतर महिलाएं अकबर के साथ अलग-अलग मीडिया संस्थानों में काम कर चुकी हैं.
सोशल मीडिया पर चल रहे #MeToo अभियान के दौरान फ़िल्म, मीडिया जगत की जानी-मानी हस्तियों के नाम सामने आए हैं जिनमें महिलाओं ने उन पर यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के आरोप लगाए हैं.
विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर पर 'प्रीडेटरी बिहेवियर' के आरोप हैं जिसमें युवा महिलाओं को मीटिंग के नाम पर कथित तौर पर होटल के कमरे में बुलाना शामिल है.
देश के सबसे प्रभावशाली संपादकों में से एक रहे एमजे अकबर, द टेलीग्राफ़, द एशियन ऐज के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर रहे हैं.
सबसे पहले उनका नाम बीते सोमवार को वरिष्ठ पत्रकार प्रिया रमानी ने लिया था. उन्होंने एक साल पहले वोग इंडिया के लिए 'टू द हार्वे वाइंस्टींस ऑफ़ द वर्ल्ड' नाम से लिखे अपने लेख को री-ट्वीट करते हुए ऑफ़िस में हुए उत्पीड़न के पहले अनुभव को साझा किया.
रमानी ने अपने मूल लेख में एमजे अकबर का कहीं नाम नहीं लिया था, लेकिन सोमवार को उन्होंने ट्वीट किया कि वो लेख एमजे अकबर के बारे में था.
उसके बाद से पाँच अन्य महिलाओं ने भी एमजे अकबर से जुड़े अपने अनुभव साझा किये हैं.
एमजे अकबर की कार्रवाई के कुछ घंटे बाद प्रिया रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को हरियाणा के रोहतक ज़िले में किसान नेता सर छोटूराम की 64 फ़ुट ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया.
लेकिन उनकी इस रैली के दौरान पीएमओ इंडिया हैंडल से किए एक ट्वीट पर सोशल मीडिया में काफ़ी नाराज़गी दिखी. बाद में इस ट्वीट को डिलीट कर दिया गया. मगर मुद्दे पर बहस शुरू हो गयी.
प्रधानमंत्री के दफ़्तर (पीएमओ) ने नरेंद्र मोदी का बयान ट्वीट किया, "ये मेरा सौभाग्य है कि मुझे किसानों की आवाज़, जाटों के मसीहा, रहबर-ए-आज़म, दीनबंधु सर छोटूराम जी की इतनी भव्य प्रतिमा का अनावरण करने का अवसर मिला."
रमानी ने भी एक बयान जारी किया.
इस बयान में उन्होंने कहा, ''मैं अपने ख़िलाफ़ मा
हरियाणा में सोशल मीडिया पर इस बयान की काफ़ी आलोचना हुई और लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी पर जातिवाद फ़ैलाने के आरोप लगाए.
प्रधानमंत्री ने सर छोटूराम की तुलना सरदार पटेल से भी की. इस पर भी सोशल मीडिया पर वाक्य युद्ध चल रहा है.
जानकार मानते हैं कि रोहतक में आयोजित इस कार्यक्रम के सहारे भारतीय जनता पार्टी ने नाराज़ चल रहे जाटों को रिझाने की कोशिश की है.
साल 2016 में आरक्षण की मांग को लेकर जाटों ने आंदोलन शुरू किया था जिसके बाद हरियाणा में जमकर हिंसा हुई थी.ट नेताओं का कहना है कि सर छोटूराम को 'जाट मसीहा' कहना उनके क़द को छोटा करने जैसा है.
अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के अध्यक्ष यशपाल मलिक ने बीबीसी से कहा, "सर छोटू राम का व्यक्तित्व ऐसा था कि उनकी वजह से अविभाजित पंजाब प्रांत में न तो मोहम्मद अली जिन्ना की चल पायी और ना ही हिंदू महासभा की. वो उस पंजाब प्रान्त की सरकार के मंत्री थे जिसका आज दो तिहाई हिस्सा पकिस्तान में है. उन्हें सरकार का मुखिया बनने का अवसर मिला तो उन्होंने कहा कि तत्कालीन पंजाब प्रांत में मुसलमानों की आबादी 52 प्रतिशत थी. इसलिए उन्होंने किसी मुसलमान को ही मुख्यमंत्री बनाने की पेशकश की और खुद मंत्री बने रहे. इसलिए ही उन्हें 'रहबर-ए-हिन्द' की उपाधि दी गयी थी."
जाट नेता सर छोटूराम के राजनीतिक क़द को सरदार पटेल से भी ऊंचा मानते हैं.
उनका कहना है कि दलित और पिछड़े लोगों ने उन्हें 'दीन बंधु' माना जबकि अंग्रेज़ों ने उन्हें 'सर' की उपाधि दी थी. वो उनके काम की वजह से था.
ट्विटर पर मोहम्मद सलीम बालियान ने लिखा, "रहबरे आज़म दीनबंधु चौधरी छोटूराम सिर्फ़ जाटों के मसीहा नहीं थे, बल्कि वे समस्त किसानों और कामगारों के मसीहा थे. एक अज़ीम शख़्सियत को सिर्फ़ जाटों का मसीहा कहना, उनकी तौहीन करने वाली बात है."
सामाजिक कार्यकर्ता और आम आदमी पार्टी से जुड़े कुलदीप काद्यान ने ट्वीट किया, "मोदी जी, सर छोटूराम जाटों के नहीं, बल्कि किसान क़ौम के मसीहा थे. ये सिर्फ़ हरियाणा को जातिवाद के नाम पर लड़वाने वालों की सोच हो सकती है. उनका चेहरा जनता के सामने आ गया है."
हरियाणा के पत्रकार महेंद्र सिंह ने फ़ेसबुक पर लिखा, "महापुरुष किसी जाति विशेष के नहीं होते. ये तो पीएम मोदी ख़ुद कह चुके हैं. फिर हरियाणा में नियम कैसे बदल गया. पीएमओ को ये बयान वापल लेना चाहिए."
हरियाणा के नारनौल से वास्ता रखने वाले ओम नारायण श्रेष्ठ ने लिखा, "यदि मोदी जी सर छोटूराम जी को केवल जाटों का मसीहा समझते हैं तो मेरा विचार है कि वो देश के करोड़ों ग़रीब किसान मजदूरों के नेता का कद छोटा कर रहे हैं."
कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भी ट्वीट किया, "प्रधानमंत्री जी! इस ट्वीट में आपने दीनबंधु रहबरे आज़म सर छोटूराम को जाति के बंधन में बाँधने की कोशिश की है. ये आपकी संकीर्ण वोट बैंक की राजनीति का जीता-जागता सबूत है. जो जाति-धर्म के विभाजन से बाहर नहीं आती."
अब उस ट्वीट को हटा लिया गया है जिसमें उन्हें 'जाटों का मसीहा' कहा गया नहानि के आरोपों पर लड़ने के लिए तैयार हूँ. सच और सिर्फ़ सच ही मेरा बचाव है.''
बयान में प्रिया रमानी ने कहा, ''मुझे इस बात से बड़ी निराशा हुई है कि केंद्रीय मंत्री ने कई महिलाओं के आरोपों को राजनीतिक साज़िश बताकर ख़ारिज कर दिया हैवकालतनामे के 41वें पन्ने पर अन्य वकीलों के साथ सीनियर वकील संदीप कपूर, वीर संधु, निहारिका करंजावाला, अपूर्व पांडे और मयंक दत्ता का नाम लिखा है, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि ये वकील इस केस की सुनवाई के दौरान एमजे अकबर की तरफ से पेश हो सकते हैं.
नेशनल हेराल्ड की एक ख़बर के मुताबिक़ जो लॉ फ़र्म एमजे अकबर का केस लड़ने वाली है, वकीलों की वही कंपनी तहलका के पूर्व चीफ़ एडिटर तरुण तेजपाल का यौन उत्पीड़न केस भी लड़ रही है. तरुण तेजपाल फ़िलहाल बेल पर जेल से रिहा हैं.
अपनी ख़बर में नेशनल हेराल्ड ने ये दावा भी किया है कि 'करंजावाला एंड कंपनी' के मालिक राएन करंजावाला पर भी यौन उत्पीड़न के आरोप लग
ये अधिकतर महिलाएं अकबर के साथ अलग-अलग मीडिया संस्थानों में काम कर चुकी हैं.
सोशल मीडिया पर चल रहे #MeToo अभियान के दौरान फ़िल्म, मीडिया जगत की जानी-मानी हस्तियों के नाम सामने आए हैं जिनमें महिलाओं ने उन पर यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के आरोप लगाए हैं.
विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर पर 'प्रीडेटरी बिहेवियर' के आरोप हैं जिसमें युवा महिलाओं को मीटिंग के नाम पर कथित तौर पर होटल के कमरे में बुलाना शामिल है.
देश के सबसे प्रभावशाली संपादकों में से एक रहे एमजे अकबर, द टेलीग्राफ़, द एशियन ऐज के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर रहे हैं.
सबसे पहले उनका नाम बीते सोमवार को वरिष्ठ पत्रकार प्रिया रमानी ने लिया था. उन्होंने एक साल पहले वोग इंडिया के लिए 'टू द हार्वे वाइंस्टींस ऑफ़ द वर्ल्ड' नाम से लिखे अपने लेख को री-ट्वीट करते हुए ऑफ़िस में हुए उत्पीड़न के पहले अनुभव को साझा किया.
रमानी ने अपने मूल लेख में एमजे अकबर का कहीं नाम नहीं लिया था, लेकिन सोमवार को उन्होंने ट्वीट किया कि वो लेख एमजे अकबर के बारे में था.
उसके बाद से पाँच अन्य महिलाओं ने भी एमजे अकबर से जुड़े अपने अनुभव साझा किये हैं.
एमजे अकबर की कार्रवाई के कुछ घंटे बाद प्रिया रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को हरियाणा के रोहतक ज़िले में किसान नेता सर छोटूराम की 64 फ़ुट ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया.
लेकिन उनकी इस रैली के दौरान पीएमओ इंडिया हैंडल से किए एक ट्वीट पर सोशल मीडिया में काफ़ी नाराज़गी दिखी. बाद में इस ट्वीट को डिलीट कर दिया गया. मगर मुद्दे पर बहस शुरू हो गयी.
प्रधानमंत्री के दफ़्तर (पीएमओ) ने नरेंद्र मोदी का बयान ट्वीट किया, "ये मेरा सौभाग्य है कि मुझे किसानों की आवाज़, जाटों के मसीहा, रहबर-ए-आज़म, दीनबंधु सर छोटूराम जी की इतनी भव्य प्रतिमा का अनावरण करने का अवसर मिला."
रमानी ने भी एक बयान जारी किया.
इस बयान में उन्होंने कहा, ''मैं अपने ख़िलाफ़ मा
हरियाणा में सोशल मीडिया पर इस बयान की काफ़ी आलोचना हुई और लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी पर जातिवाद फ़ैलाने के आरोप लगाए.
प्रधानमंत्री ने सर छोटूराम की तुलना सरदार पटेल से भी की. इस पर भी सोशल मीडिया पर वाक्य युद्ध चल रहा है.
जानकार मानते हैं कि रोहतक में आयोजित इस कार्यक्रम के सहारे भारतीय जनता पार्टी ने नाराज़ चल रहे जाटों को रिझाने की कोशिश की है.
साल 2016 में आरक्षण की मांग को लेकर जाटों ने आंदोलन शुरू किया था जिसके बाद हरियाणा में जमकर हिंसा हुई थी.ट नेताओं का कहना है कि सर छोटूराम को 'जाट मसीहा' कहना उनके क़द को छोटा करने जैसा है.
अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के अध्यक्ष यशपाल मलिक ने बीबीसी से कहा, "सर छोटू राम का व्यक्तित्व ऐसा था कि उनकी वजह से अविभाजित पंजाब प्रांत में न तो मोहम्मद अली जिन्ना की चल पायी और ना ही हिंदू महासभा की. वो उस पंजाब प्रान्त की सरकार के मंत्री थे जिसका आज दो तिहाई हिस्सा पकिस्तान में है. उन्हें सरकार का मुखिया बनने का अवसर मिला तो उन्होंने कहा कि तत्कालीन पंजाब प्रांत में मुसलमानों की आबादी 52 प्रतिशत थी. इसलिए उन्होंने किसी मुसलमान को ही मुख्यमंत्री बनाने की पेशकश की और खुद मंत्री बने रहे. इसलिए ही उन्हें 'रहबर-ए-हिन्द' की उपाधि दी गयी थी."
जाट नेता सर छोटूराम के राजनीतिक क़द को सरदार पटेल से भी ऊंचा मानते हैं.
उनका कहना है कि दलित और पिछड़े लोगों ने उन्हें 'दीन बंधु' माना जबकि अंग्रेज़ों ने उन्हें 'सर' की उपाधि दी थी. वो उनके काम की वजह से था.
ट्विटर पर मोहम्मद सलीम बालियान ने लिखा, "रहबरे आज़म दीनबंधु चौधरी छोटूराम सिर्फ़ जाटों के मसीहा नहीं थे, बल्कि वे समस्त किसानों और कामगारों के मसीहा थे. एक अज़ीम शख़्सियत को सिर्फ़ जाटों का मसीहा कहना, उनकी तौहीन करने वाली बात है."
सामाजिक कार्यकर्ता और आम आदमी पार्टी से जुड़े कुलदीप काद्यान ने ट्वीट किया, "मोदी जी, सर छोटूराम जाटों के नहीं, बल्कि किसान क़ौम के मसीहा थे. ये सिर्फ़ हरियाणा को जातिवाद के नाम पर लड़वाने वालों की सोच हो सकती है. उनका चेहरा जनता के सामने आ गया है."
हरियाणा के पत्रकार महेंद्र सिंह ने फ़ेसबुक पर लिखा, "महापुरुष किसी जाति विशेष के नहीं होते. ये तो पीएम मोदी ख़ुद कह चुके हैं. फिर हरियाणा में नियम कैसे बदल गया. पीएमओ को ये बयान वापल लेना चाहिए."
हरियाणा के नारनौल से वास्ता रखने वाले ओम नारायण श्रेष्ठ ने लिखा, "यदि मोदी जी सर छोटूराम जी को केवल जाटों का मसीहा समझते हैं तो मेरा विचार है कि वो देश के करोड़ों ग़रीब किसान मजदूरों के नेता का कद छोटा कर रहे हैं."
कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भी ट्वीट किया, "प्रधानमंत्री जी! इस ट्वीट में आपने दीनबंधु रहबरे आज़म सर छोटूराम को जाति के बंधन में बाँधने की कोशिश की है. ये आपकी संकीर्ण वोट बैंक की राजनीति का जीता-जागता सबूत है. जो जाति-धर्म के विभाजन से बाहर नहीं आती."
अब उस ट्वीट को हटा लिया गया है जिसमें उन्हें 'जाटों का मसीहा' कहा गया नहानि के आरोपों पर लड़ने के लिए तैयार हूँ. सच और सिर्फ़ सच ही मेरा बचाव है.''
बयान में प्रिया रमानी ने कहा, ''मुझे इस बात से बड़ी निराशा हुई है कि केंद्रीय मंत्री ने कई महिलाओं के आरोपों को राजनीतिक साज़िश बताकर ख़ारिज कर दिया हैवकालतनामे के 41वें पन्ने पर अन्य वकीलों के साथ सीनियर वकील संदीप कपूर, वीर संधु, निहारिका करंजावाला, अपूर्व पांडे और मयंक दत्ता का नाम लिखा है, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि ये वकील इस केस की सुनवाई के दौरान एमजे अकबर की तरफ से पेश हो सकते हैं.
नेशनल हेराल्ड की एक ख़बर के मुताबिक़ जो लॉ फ़र्म एमजे अकबर का केस लड़ने वाली है, वकीलों की वही कंपनी तहलका के पूर्व चीफ़ एडिटर तरुण तेजपाल का यौन उत्पीड़न केस भी लड़ रही है. तरुण तेजपाल फ़िलहाल बेल पर जेल से रिहा हैं.
अपनी ख़बर में नेशनल हेराल्ड ने ये दावा भी किया है कि 'करंजावाला एंड कंपनी' के मालिक राएन करंजावाला पर भी यौन उत्पीड़न के आरोप लग
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